इंसान की फितरत

इंसान की फितरत को समझना इतना आसान नहीं है , क्योंकि जो उसका स्वार्थ है वही उसको  अच्छा या बुरे की क्षेणी में खड़ा करता है।  किसी को अच्छा या बुरा हम अपने मन की ख़ुशी से देखते हैं न की आत्मा की नज़र से।  क्योंकि आत्मा न्याय की वो अन्धी देवी है जिसमें प्यार और स्नेह नहीं होता है जबकि मन एक विचलित प्राणी है जो सिर्फ अपने को खुश और दूसरे को दुखी देखना चाहता है। इसलिए मनुष्य की फितरत  एक स्वार्थ को  जन्म देती है। स्वार्थ  अच्छे  भी होते हैं और बुरे भी।  जब इंसान पक्षियों को दाना या पानी देता है तो वो भी एक तरह का स्वार्थ है, क्योंकि वो चाहता है की हमारा पर्यावरण जीवित रहे।  जब हम अपने माता-पिता या बड़े को अपने आस-पास देखने की कोसिस करते हैं तो हम अपनी फितरत के अनुसार चाहते हैं की वो हमें समाज में रहने का सलीका सिखाएं।  क्योंकि समाज एक ऐसी जगह है की जहाँ फर कोई अपने को समाहित नहीं कर पता है जिससे उसका आचरण और दूसरों के तरीके में बहुत विभिन्नता आ जाती है।

जब हम किसी को स्पर्श करते हैं तो हमारा स्पर्श करने का तरीका हमारी फितरत को परिभाषित करता है. मनुष्य के सुख-दुःख में ही इंसानी नियत को देखा  जा सकता है, जब इंसान खुश होता है तो बाकी इंसान उसको मूर्ख प्रतीत होते हैं , और जब वही इंसान देखि होता है तो वो उन्ही मूर्ख प्रतीत व्यक्तियों से उम्मीद की आशा संजोय रहता है। हमारा आचरण कोई जन्मजात नहीं है, ये समय और माहौल के हिसाब से अपने को संगठित करता है और दुसरो से भी वही संगठित होने की लालसा करता है, जबकि इंसान कोई रोबोट नहीं है जो  कोई प्रोग्रामिंग से चलता हो, इंसान तो अनन्तः है जिसका कोई भी सिरा नहीं है। आत्मा कभी किसी का गलत नहीं चाहती है, लेकिन मन का विस्तार आत्मा की सेना को धराशायी करता है, जिससे मनुष्य धोखा देना, चोरी करना , गलत काम करने जैसे संसार में कदम रखता है। किसी  को जानबूझकर दिया हुआ धोखा , चोरी करना और गलत काम से भी ज्यादा पापी है, क्योंकि तब आप सामने वाले के संस्कार को अपने राक्षस जैसे दिमाग से हराते हैं। वैसे भी हमारे ग्रंथो में राक्षस को हमेशा पाई माना गया है।  आज भी उनकी प्रवृति कुछ इंसानो में दिखती है। बात ये भी सही है की कोई फितरत किसी को थोपी हुई वस्तु नहीं है जो बारी-बारी से सभी उसको प्रयोग में लाते हैं, ये तो ऐसी चीज़ है जिसको बदलना मतलब कुत्ते की पूँछ सीधा करने जैसा सरीखा है।

आज के संसारिक मोह माया में कोई किसी का भला जल्दी नहीं चाहता है, और जो किसी का भला चाहता है तो उनसे बहुत दुःख देखें होंगे जिसको सोचकर उसकी आत्मा कहती होगी की उसको वो दिन देखने से बचा लो।  जिसने आत्मा  की बात सुनी वो तो अपने को समाज में रहने का एक प्रतिष्ठ स्थान पा लेगा , अन्यथा मन की फितरत से  आदमी  कभी भी शांतचित नहीं रह सकता और विचारों के खेल में वो गलत  श्रेणी में स्थान  लेता जाता है।  आपके विचार आपको सही स्थान की ओर ले जाना चाहती है लेकिन आपकी फितरत आपको या तो अच्छा ले जाएगी या बुरा ले जाएगी।

इसलिए मनुष्य को अपनी फितरत को जांचने के लिए अपनी आत्मा की वाणी सुननी चाहिए की आप सही कर रहे हैं या गलत।


शिशिर कान्त सिंह

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