ख़ुशी

ख़ुशी एक व्यवस्था है जो हमें सकारात्मकता की ओर ले जाती  है। जब हम किसी चीज़ को महसूस करते हैं तो  वो एक ख़ुशी  का बोध करती है, चाहे चीज़ पैसा हो, प्यार हो, संस्कार हो, इज़्ज़त हो इत्यादि। हाँ, ख़ुशी  और हंसी को मैं एक सामान नहीं मनाता, क्योंकि ख़ुशी हमारी इच्छाओँ पर केंद्रित होती हैं और हंसी हमारी भावनाओं पर। हमारी भावनाएं किसी चुटकुले पर, किसी मज़ाक पर , किसी के उपहास यदि पर ज्यादा हंसी देती है जो की एक क्षणिक अनुभव होता है।  इच्छाएँ असीमित होती हैं, इच्छाओँ  को वश में रखना भी बहुत जरुरी है। अपनी संतुष्टि के अनुसार इच्छाओँ  पर कार्य करना चाहिए।  धीरे धीरे इच्छाओँ को पूर्ण करके आगे की इच्छाओँ पर कार्य करना चाहिए, जिससे आपकी ख़ुशी का धरातल हमेशा बुनियादी रहेगा।  जरुरत तो हमें सकारत्मक रवैया रखने की है जिससे हम हमेशा संतुष्टि का अनुभव कर सकते हैं।

हम ऐसे मौकों से भी गुजरते हैं जहाँ हम अपने को बहुत टुटा हुआ या असफल व्यक्ति महसूस करते हैं, तब जब एक उम्मीद की कोई किरण सिर्फ सुनाई देने से ही हमारे अंदर एक ख़ुशी महसूस होने लगती है , ये क्षण हमको  ऐसा प्रतीत होता है की दुःख के बाद सुख जरूर आता है।  ये तो सिर्फ सुनाई देने मात्र की अवस्था है, कहीं वो किरण हमारे दुःख दूर करने लगे तो स्वतः ही ख़ुशी एक साकारत्मक सोच में बदल जाती है और हमारे अंदर भी सभी नकारात्मकता का गमन होने लगता है।   नकारात्मकता सिर्फ हमें उदासीनता की ओर आकर्षित करती है।  हम जैसा सोचते हैं और जैसा व्यहवार करते हैं वही घूम कर हमारे पास आता है। दूसरों के साथ खुशियां बांटने में हम खुद के अंदर ख़ुशी को महसूस करते हैं। यदि हम दूसरों को बुरी लगने वाली बातों को नज़रअंदाज़ कर दें और सिर्फ ये कल्पना करें की मैं बहुत की खुशनसीब इंसान हूँ, तो सदैव हम खुश रहेंगे , बस केवल एक सकारात्मक सोच और व्यहवार अपनाने की जरुरत है।  इसके साथ हमको अपनी स्वार्थी  इच्छाओँ को भी त्यागना होगा , क्योंकि हम हमेशा श्रेष्ठ नहीं हैं।

अपनी इच्छाओँ को समझना और उसके बाद अपनी योग्यता और सामर्थ्य पर भी गहन अध्ययन करना चाहिए, क्योंकि हमारे पास कई विकल्प रहते हैं , लेकिन एक समय एक विकल्प चुनना होता है तो हमको हमारी प्राथमिकता पर ध्यान देना चाहिए।  तभी ख़ुशी को आनन्दित किया जा सकता है। हमारी  प्राथमिकता परीक्षा में आने वाले बहुविकल्पी प्रश्रों की तरह हैं यदि गलत विकल्प चुना तो उसका दंड दुःख के रूप में मिलता है।  तो ये हमको तय करना होता है की किसे पाकर हम खुश हो सकते हैं।  जो चीज़ हमारे बस में नहीं है और उसको अपनी इच्छाशक्ति को अपार करके भी नहीं प् सकते, उसके लिए दुखी होना निरथ्य है।  हम जिसको बदल नहीं सकते, उसको स्वीकार करना ही हमारे लिए बेहतर है।  कभी हम सब संसारिक मोह की उलझनों में फँस जाते हैं, तब हम अपने मनोवैज्ञानिक शब्द को अपने जीवन में पाते हैं, जो इसको समझ गया या अपना लिया वो हर क्षेत्र और हर अवस्था को संभाल लेता है। जैसे की मज़ाक में बोला जाये तो हर नर-नारी अपने जीवनसाथी के रूप में हीरो-हेरोइन जैसा सुंदरता चाहता है लेकिन सच्चाई इसकी उल्ट होती है।  शादी होने के बाद जैसा भी जीवनसाथी या जीवनसाथिनी हो, अपनाना ही पड़ेगा और हमें उसकी हर गलती को हंसकर टालना भी होगा, ये ही ख़ुशी है , क्योंकि ये सब दीर्घकालिक ख़ुशी के लिए बहुत जरुरी है।

त्वरित ख़ुशी और लम्बे समय की ख़ुशी में अंतर है। त्वरित शब्द से समझ आ रहा होगा की ये क्षणिक ख़ुशी होती है जो की थोड़े समय के लिए मन में उल्लास ला देती है , जैसे की बच्चों को उनके मन मुताबिक बॉक्स मिल जाना , स्कूल में किसी पीरियड में मास्टर का न आना , या ऑफिस में काम करने वाले व्यक्ति को छुट्टी मिल जाना, किसी को कोई उपहार मिल जाना इत्यादि , ये  सब एक त्वरित ख़ुशी है क्योंकि इसके बाद के पीरियड में मास्टर आएंगे , ऑफिस वाला व्यक्ति अगले दिन ज्यादा काम करेगा , उपहार वाला व्यक्ति भी बदले में कोई उपहार देने के बारे में सोचेगा।  बहुत  से अंतहीन उदाहरण है त्वरित ख़ुशी के।  इसे ऐसे कहें की त्वरित ख़ुशी  एक पल का आनंद है  जो मनुष्य पल  भर के लिए आनंदित होता है।  इसको पाने के लिए मनुष्य को कोई मेहनत नहीं करनी पड़ती है।

जबकि लम्बे समय की ख़ुशी की  बात करें  तो इसके लिए मनुष्य को मेहनत करनी पड़ती है।  जैसा की  आप कोई परीक्षा (नौकरी)  पास करते  हैं तो  इसका प्रभाव लम्बे  समय तक ख़ुशी देता है, जबकि इसको पाने के लिए आपने कई बाधाओं को पार किया होगा, लेकिन नौकरी की ख़ुशी आपको इन बाधाओं पर विजय दर्शाती है।  ख़ुशी महसूस करने में बहुत समय और प्रयास लगता है। व्यापार करने वाला व्यक्ति बहुत हानि – लाभ देखता है , लेकिन उसकी लगन और प्रयास उसको  एक सफल व्यापारी बनाता है , ये अहसास उसको जीवन भर ख़ुशी में दिखती है।  तो हमको हमेशा लम्बी अवधि की ख़ुशी को प्राथमिकता देनी चाहिए जिसका हमारे परिवार पर भी एक प्रभाव  पड़ता है।

ख़ुशी को महसूस करना  और हासिल करना , सब हमारे हाथ में होता है।  ख़ुशी, संतुष्टि और आनंद सब हमारे भीतर ही छुपा हुआ है, जरुरत है केवल उसे पहचानने  की।  इससे कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए की हम कौन है और किस अवस्था में हैं। यदि हम चाहें तो सकारात्मक सोच से ख़ुशी को अपने अंदर ही महसूस कर सकते हैं।


शिशिर कान्त सिंह

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